हमारी बिल्डिंग के कोम्पौंड के एक कोने में छोटा सा एक शिवलिंग हुआ करता था. जब भी बिल्डिंग के लोगों का कोई धार्मिक भाव उमड़ता था वो जाकर वहां पर फूल चढ़ा, पानी छिड़क, श्लोकों के नाम पर कुछ अनाप शनाप उच्चार कर चले आते थे. फिर ज्यों ज्यों retired और वेहले लोगों की संख्या बढ़ी उस शिवलिंग के आसपास एक चबूतरा उगने लगा, और जैसे की हमारे देश में मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे झट से किसी जंगली बेल की तरहां उग आते हैं, किसी भी जगह, बिना चेतावनी के, उस शिवलिंग के आसपास बन गया एक लोहे का जंगला और वो भोलेनाथ जो अब तक सभी दिशाओं से उपलब्थ थे घिर गए एक कटहरे में और उस कटहरे में लग गया एक गेट. एक परिवार के नाते हमारे लिए वो जंगला एक एहमियत रखता है क्यों की हमारी बिटिया को उसकी छत पर लटके घण्टे को किसी बड़े की गोदे में चढ़ कर, ऊँचे हो कर, बजाने का बहुत शौंक है.
धीरे धीरे उस जंगले-बनाम-मंदिर की प्रसिद्धि बिल्डिंग के चरों और फैलने लगी और लोग आने लगे दूर दूर से फूल चढ़ाने, पानी छिड़कने (इस बिल्डिंग में वैसे लोग प्यासे को पानी नहीं पूछते) और मंत्रोचारण करने. पर इससे शायद भगवान खुश नहीं हुए — कुछ खास बात नहीं बन रही थी. हमारी बिल्डिंग के जो लोग कमज़ोर को तैश दिखाते और झिड़कते हैं, बराबर वाले से कन्नी काटते हैं व् जलन खाते हैं और ताक़तवर को देख कर मिमियाने लगते हैं या फिर निकल लेते हैं पतली गली से, वो भला भगवान से सीधे मुंह क्या बात करेंगे, सो निश्चेय किया गया एक पंडितजी को तनख्वाह पर रखा जाये. सो रोज़ पंडितजी आने लगे. वो मंदिर के देखबाल करते, मूर्तियों को साफवाफ करते और लगे हाथ, अब ज्योंकि आये हैं, तो कुछ पूजापाठ भी हो जाता. शिव की जटाएं ज़रा हिलती प्रतीत हुईं और वो ज़रा खुश लगे.
अब जबकि भगवान, जो की अब तक विस्थापित थे, थोडा खुश लगे, तो उनकी स्थापना का विचार हुआ. बिल्डिंग वालों से पैसा इकठ्ठा किया गया. हमने न तो पैसा तब दिया जब जंगला बनाया गया, न तब दिया जब पंडित जी रखे गए, और न ही तब दिया जब मंदिर स्थापना के लिए और बढ़ाया गया. पता नहीं कितने हज़ार उस स्थापना पर खर्च किये गए. इन्ही लोगों से अगर आप कहें किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई के लिए थोड़े से पैसे इकट्ठे कर लो, दस बहाने निकल आएंगे. और तो और, इस बिल्डिंग में ज़्यादातर लोग शिक्षक हैं; न मालूम क्या कांड करते होंगे कक्षा में और छात्रोंको क्या मूल्य देते होंगे. एक बड़ी मज़ेदार बात हुई स्थापना वाले दिन.
हमारे यहाँ दो काम करने वाली आती हैं और वे अक्सर खाना और नाश्ता हमारे घर से कर के जाती हैं. उस दिन उन लोगों ने कुछ नहीं खाया; कहा, आज तो भंडारा होगा, खूब हलवा-पूरी-छोले बंटेंगे. एक ने तो ये भी कहा की अगर आप लोग भंडारे में नहीं जा रहे हैं तो कोई बात नहीं, आप के लिए भी हम लेते आएंगे. ऐसे अवसर पर लोग अक्सर प्रयत्न करते हैं की गरीबों को ज्यादा खिलाया जाये. पर शायद जब आप प्रबंध करते हैं तो ये आपका हक़ बनता ये फैसला करने का की कौन वाकई में ग़रीब है. कुछ ऐसा हुआ उस दिन जो हमने कभी न देखा था न सुना था. जिन लोगों ने स्थापना समारोह का प्रबंध किया था, उन्होंने न तो किसी और को बुलाया, न ही कुछ खिलाया, और जो हलवा-पूरी-छोले बने थे भंडारे के लिए, वो सब वे लोग अपने अपने घरों में ले गए — काम करने वालियों सो कहा खाना-वाना बनाने की ज़रुरत नहीं है. बेचारे काम करने वाले यां तो मुंह बाएँ देखते रहे, यां बेशर्म हो कर, मांग कर थोड़ा बहुत खा गए. वैसे मुझे तो इसमें कुछ खास आपत्तिजनक नहीं लगा क्योंकि दिमागी तौर पर इनसे ग़रीब लोग मुश्किल से ही मिलेंगे, तो शायद ये सब एक फिलोसोफिकल अनुभूति थी.
अब जिन लोगों ने स्थापना के लिए पैसा जुटाया यां दिया उनका हक तो भगवान पर ज्यादा बनता ही है. और फिर जब इतना पैसा लगाया ही है तो धार्मिक बहुरूपता क्यूँ न हो? क्यूँ लोग विवश हों केवल शिवजी के दर्शन करने को जब ढेरों विकल्प हैं हमारे पास? भगवानो की कोई कमी है हमारे यहाँ क्या? केबल चैनलों से ज्यादा भगवानी चुनाव हैं हमारे पास. उस बड़े जंगले में जहाँ भगवान शिव अकेले स्थापित थे कई छोटे छोटे खांचे बन गए और उन खांचों में स्थापित हो गए कईयों के छोटे-बड़े भगवान. भगवानों का अच्छा-खासा gang बन गया उस कोने में और बीच में शिवजी खड़े रहते हैं गौड फादर की तरहां. पर अंत बस यहीं पर नहीं हुआ.
भगवान अक्सर कीमती हो जाता है तो चोरी होने का डर लाज़मी है. जितने ज्यादा भगवान लोग उतनी ज्यादा फिक्र. पांच-छेह भगवानों के बक्से हैं वहां पर और सब भगवानों की अपनी शानो-शौकत, और इस लिए, अपनी चिंता है. तो सब बक्सों पर लग गए हैं ताले — जैसे लोगों के बैंक में अपने-अपने प्राइवेटलौक्कर होते हैं यहाँ पर लोगों के अपने-अपने धार्मिक डिब्बे हैं जिनमे उन्होंने अपने-अपने भगवानो को बंद कर दिया है. लेकिन एक बड़ा गेट भी है जहाँ से आप मंदिर में घुसते हैं. अब कुछ विशिष्ठ लोगों के पास उसकी चाभी है और कुछ कम विशिष्ठ लोगों के पास नहीं है. तो अगर आप मंदिर में जा कर पूजा करना चाहते हैं तो पहले पता कीजिये किसके पास चाभी है, अपने साधारण नागरिक होने का परमाण देते हुए चाभी का अग्रेह कीजिये, और अगर चाभी मिल जाये तो जा कर पूजा अचर्ना कीजिये. इस चक्कर में कुछ लोग तूतू-मैंमैं पर भी उतारू हो गए हैं. अब ऐसा तो हैं नहीं की जो लोग करता-धर्ता हैं उनकी आपस में बहुत पटती है — कोई किसी को फूटी आँख नहीं सुहाता. सो हर कोई अब वहां पर अपना ताला लगाना चाहता है, और क्यूँ नहीं? भाई अगर मैंने रोकड़ा लगाया है, अपना कीमती समय और ध्यान दिया है, तो ताला चाभी मेरा क्यूँ ना हो? सब वहां पे अब अपना-अपना ताला लगाने क्या जुगाड़ कर रहे हैं.
एक शिवलिंग जो चारो तरफ से खुला था वो अब चंद लोगों के अहम् के पिंजड़े में बंद हो कर रह गया है. पूजा और भक्ति की बजाये ताला और शक्ति की बाते ज्यादा होती हैं. इसकी भी एक वजह है.
जब आप इंसानी रूप से बौने बन जाते हैं, तो आप को छोटे-छोटे पौधे भी विशाल पेड़ों जैसे दिखने लगते हैं.


